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Showing posts with the label 4. मगध राज एवं राजवंश

मगध राज्य का उत्कर्ष

मगध राज्य का उत्कर्ष  सोलह महाजनपदों में मुख्य प्रतिद्वन्दिता मगध और अवन्ति के बीच में थी इनमें भी अन्तिम विजय मगध को मिली। क्योंकि उसके पास अनेक योग्य शासक (बिम्बिसार, अजातशत्रु आदि) थे। लोहे की खान भी मगध में थी हलाँकि अवन्ति के पास भी लोहे के भण्डार थे। मगध की प्रारम्भिक राजधानी राजगिरि या गिरिब्रज पाँच तरफ पहाडि़यों से घिरी थी बाद की राजधानी पाटिलपुत्र, गंगा, सोन एवं सरयू के तट पर स्थित थी इन सब कारणो से अन्ततः विजय मगध को मिली। मगध साम्राज्य का दो महान काव्य रामायण और महाभारत में उल्लेख किया गया है | मगध साम्राज्य का वंश बृहद्रथ वंश मगध साम्राज्य के उत्थान में सर्वप्रथम बृहद्रथ वंश का नाम आता है। चेदि के राजा वसु के पुत्र बृहद्रथ ने प्रागैतिहासिक काल में सर्वप्रथम मगध में अपना साम्राज्य स्थापित किया और बृहद्रथ वंश की नींव डाली। बृहद्रथ महाभारतकालीन कृष्ण का घोर शत्रु था। मगध का उत्थान इसी के शासनकाल से माना जाता है। बृहद्रथ का पुत्र जरासंध भी मगध का प्रतापी राजा था जो मल्लयुद्ध में भीम द्वारा मारा गया। इस वंश का अंतिम शासक रिपुंजय अथवा निपुंजय था, इसकी हत्या उसक...

विदेशी आक्रमण

विदेशी आक्रमण भारत पर प्रथम विदेशी आक्रमण ईरान के हखमनी वंश के शासकों ने किया था। हखमनी वंश का संस्थापक साइरस (559-529 ई-पू-) था। साइरस ने जैड्रोसिया के रेगिस्तानी मार्ग से होकर भारत पर आक्रमण करने का प्रयास किया जो असफल रहा। भारत पर आक्रमण करने में प्रथम सफलता साइरस के उत्तराधिकारी दारा प्रथम (दारायवहु) (522-486 ई-पू-) को प्राप्त हुई। दारा (डेरियस) ने 516 ई-पू- में पश्चिमोत्तर भारत के पंजाब, सिंधु नदी के तटवर्ती भूभाग एवं सिंध को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया। डेरियस का उत्तराधिकारी क्षयार्ष (जरक्सीज) ने यूनानियों के विरुद्ध संघर्ष में भारतीयों को अपनी फौज में शामिल किया। ईरानियों ने भारत में खरोष्ठी लिपि को लेखन में प्रचलित किया। पश्चिमोत्तर सीमाप्रांत से ईरानी सिक्के प्राप्त हुए हैं। ईरानियों ने आरमाइक लिपि का प्रचार-प्रसार किया। ईरानी आक्रमण के पश्चात् भारत को यूनानी आक्रमणकारी सिकन्दर का सामना करना पड़ा। सिकन्दर मेसीडोनिया (मकदूनिया) के क्षत्रप फिलिप द्वितीय का पुत्र था। सिकन्दर के गुरू का नाम अरस्तु था। 326 ई-पू- में सिकंदर ने अपना भारत विजय अभियान प्रारंभ किय...

मगध साम्राज्य के मौर्य, सुंग , कण्व, एवं सातवाहन वंश

मौर्य साम्राज्य   चंद्रगुप्त मौर्य मौर्य वंश का संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य था। घनानंद को हराने में चाणक्य ने चंद्रगुप्त मौर्य की मदद की थी जो बाद में चंद्रगुप्त का प्रधानमंत्री बना। चाणक्य द्वारा लिखित पुस्तक है अर्थशास्त्र जिसका संबंध राजनीति से है, चाणक्य को कौटिल्य तथा विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है। चंद्रगुप्त जैन धर्म का अनुयायी था। चंद्रगुप्त ने अपना अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया। चंद्रगुप्त ने सेल्यूकस निकेटर को हराया, जो कि सिकंदर का सेनापति था। मेगास्थनीज सलोकस निकेटर का राजदूत था जो चंद्रगुप्त के दरबार में रहता था। नंद वंश के विनाश करने में चंद्रगुप्त मौर्य ने कश्मीर के राजा पर्वतक से सहायता प्राप्त की थी।     बिंदुसार चंद्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिंदुसार हुआ जो 298 ईसवी पूर्व में मगध की राज गद्दी पर बैठा। अमित्रघात के नाम से बिंदुसार जाना जाता था जिसका अर्थ है शत्रु विनाशक। वायु पुराण में बिंदुसार को भद्रसार या वारिसार कहा गया है। बिंदुसार के शासन काल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन है इस विद...