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Showing posts with the label 7. दक्षिण भारत के प्रमुख राजवंश

पल्लव वंश

पल्लव वंश पल्लव वंश का संस्थापक सिंह विष्णु था (575-600ई०)। इसकी राजधानी कौन सी थी जो की तमिलनाडु में कांचीपुरम है। सिंह विष्णु वैष्णो  धर्म का अनुयायी था। किरातार्जुनीयम् के लेखक भारवी, श्रीविष्णु के दरबार में रहते थे। पल्लव वंश का अंतिम शासक अपराजित (879 से 897 ई०) हुआ। मत्तविलास प्रहसन की रचना महेंद्रवर्मन ने की थी। महाबलीपुरम के एकाश्म मंदिर जिन्हे रथ कहा गया है का निर्माण पल्लव राजा नरसिंह वर्मन प्रथम के द्वारा कराया गया था। रथ मंदिरों में सबसे छोटा द्रौपदी रथ है, जिसमें किसी प्रकार का अलंकरण नहीं मिलता है। वातपीकोण्ड की उपाधि नरसिंह वर्मन प्रथम ने धारण की थी। कांची के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण नरसिंहवर्मन द्वितीय ने कराया था। इसे राजसिद्धेश्वर मंदिर कहा जाता है। (महाबलीपुरम में शोर मंदिर) दशकुमार चरित्र के लेखक दण्डी, नरसिंहवर्मन द्वितीय के दरबार में रहते थे। कांची के मुक्तेश्वर मंदिर तथा बैकुंठ पेरुमल मंदिर का निर्माण नंदी वर्मन द्वितीय ने कराया। प्रसिद्ध वैष्णव संत तिरुमडग़्ई अलवार, नंदी वर्मन द्वितीय के समकालीन थे।

राष्ट्रकूट

राष्ट्रकूट राष्ट्रकूट राजवंश के संस्थापक दंतिदुर्ग (762ई०) था। इसकी राजधानी मनकिर या मान्यखेत वर्तमान (मालखेड़ी, सोलापुर) के निकट थी। एलोरा के प्रसिद्ध कैलाश मंदिर का निर्माण कृष्ण प्रथम ने करवाया था। ध्रुव, राष्ट्रकूट वंश का पहला शासक था, जिसने कन्नौज पर अधिकार करने हेतु त्रिपक्षीय संघर्ष में भाग लिया और प्रतिहार नरेश वत्सराज एवं पाल नरेश धर्मपाल को पराजित किया। ध्रुव को 'धारावर्ष' भी कहा जाता था। अमोघवर्ष जैन धर्म का अनुयाई था इसने कन्नड़ में कविराजमार्ग की रचना की । आदिपुराण के रचनाकार जिनसेन, गणितासार संग्रह के लेखक महावीराचार्य एवं अमोघवृत्ति के लेखक सक्तयना, अमोघवर्ष के दरबार में रहते थे। इंद्र तृतीय के शासनकाल में अरब निवासी अलमसूदी भारत आया उसने तात्कालीन राष्ट्रकूट शासकों को भारत का सर्वश्रेष्ठ शासक कहा। राष्ट्रकूट वंश का अंतिम महान शासक कृष्ण तृतीय था। इसी के दरबार में कन्नड़ भाषा के कवि पोन्न रहते थे जिन्होंने शांति पुराण की रचना की। एलोरा एवं एलिफेंटा (महाराष्ट्र) गुहा मंदिरों का निर्माण राष्ट्रकूटों के समय में ही हुआ।

चालुक्य वंश (कल्याणी)

चालुक्य वंश (कल्याणी) कल्याणी के चालुक्य तैलप द्वितीय ने 973 ईस्वी में कर्क को हराकर राष्ट्रकूट राज्य पर अपना अधिकार कर लिया और कल्याणी के चालुक्य वंश की नींव डाली। तैलप द्वितीय की राजधानी मान्यखेत थी। इस वंश का सबसे प्रतापी शासक विक्रमादित्य छठा था। भारत में विक्रमादित्य राजाओं की संख्या 14 है। मिताक्षरा (हिंदू विधि ग्रंथ याज्ञवल्क्य स्मृति पर व्याख्या) नामक ग्रंथ की रचना महान विधिवेत्ता विज्ञान ईश्वर ने की थी। विक्रमांकदेवचरित की रचना विल्हण ने की थी इसमें विक्रमादित्य छठा के जीवन पर प्रकाश डाला गया है।

चालुक्य वंश (वातापी)

चालुक्य वंश (वातापी) जयसिंह ने वातापी के चालुक्य वंश की स्थापना की थी। इसकी राजधानी वातापी (बीजापुर) के निकट थी। इस वंश के प्रमुख शासक थे- पुलकेशिन प्रथम, कीर्ति वर्मन, पुलकेशिन द्वितीय, विक्रमादित्य, विनियादित्य एवं विजयादित्य। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा पुलकेशिन द्वितीय था। पुलकेशिन द्वितीय ने हर्षवर्धन को हराकर परमेश्वर की उपाधि धारण की थी। ऐहोल अभिलेख का संबंध पुलकेशिन द्वितीय से है तथा इसके रचनाकार रविकृति है। जिनेंद्र का मेगुती मंदिर पुलकेशिन द्वितीय ने बनवाया था। वातापी का निर्माणकर्ता कीर्ति वर्मन को माना जाता है। इस वंश का अंतिम राजा कीर्ति वर्मन द्वितीय था। इसे इसके सामंत दंतिदुर्ग में परास्त कर एक नए वंश (राष्ट्रकूट वंश) की स्थापना की।

चालुक्य वंश (वेंगी)

चालुक्य वंश (वेंगी) वेंगी के चालुक्य वंश का संस्थापक विष्णु वर्धन था। इसकी राजधानी वेंगी, (आंध्र प्रदेश) में थी। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा विजयआदित्य तृतीय था, जिसका सेनापति पांडुरंग था। इस वंश के प्रमुख शासक थे- जयसिंह प्रथम, इंद्रवर्धन, विष्णुवर्धन द्वितीय, जयसिंह द्वितीय एवं विष्णुवर्धन तृतीय।

चोल वंश

चोल वंश 9 वी शताब्दी में चोल वंश पल्लवो के ध्वंसावशेषो पर स्थापित हुआ। चोल वंश के संस्थापक विजयालय (850 से 870 ई०) था। चोलो का स्वतंत्र राज्य आदित्य प्रथम स्थापित किया। पल्लवों पर विजय पाने के उपरांत आदित्य प्रथम ने कोदण्डराम की उपाधि धारण की। राजराज प्रथम शैव धर्म का अनुयाई था। राजराज प्रथम ने तंजौर में राजराजेश्वर का शिव मंदिर बनवाया जिसे बृहदेश्वर मंदिर से भी जाना जाता है। चोल साम्राज्य का सर्वाधिक विस्तार राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में हुआ। चोल वंश का अंतिम राजा राजेंद्र तृतीय था। विक्रम चोल, आभाव एवं अकाल से ग्रस्त गरीब जनता से राजस्व वसूल कर चिदंबरम् मंदिर का विस्तार करवा रहा था। कोलतुंग द्वितीय ने चिदंबरम मंदिर में स्थित गोविंद राज (विष्णु) की मूर्ति को समुद्र में फेकवा दिया। कालांतर में वैष्णो आचार्य  रामानुजाचार्य ने उक्त मूर्ति का पुनद्धार किया और उसे तिरुपति के मंदिर में प्राण प्रतिष्ठित किया। संपूर्ण चोल साम्राज्य 6 प्रांतों में विभक्त था।  प्रांत को मंडलम कहा जाता था ।मंडलम को कोट्टम, कोटृम नाडु में एवं नाडु कई कुर्रमों में विभक्त था। स्थानीय स्वशासन...

दक्षिण भारत के अन्य छोटे राजवंश

यादव वंश देवगिरि के यादव वंश की स्थापना भिल्लम पंचम ने कि उसकी राजधानी देवगिरी थी। इस वंश का सबसे प्रतापी राजा सिंहण (1210 से 1246 ई०) था। इस वंश का अंतिम स्वतंत्र शासक रामचंद्र था जिसने अलाउद्दीन के सेनापति मलिक काफूर के सामने आत्मसमर्पण किया। होयसल वंश द्वारसमुद्र के होयसल वंश की स्थापना विष्णुवर्धन ने की थी। होयसल वंश यादव वंश की एक शाखा थी। बेलूर में चेन्नकेशव मंदिर का निर्माण विष्णुवर्धन ने 1117 ईस्वी में किया था। होयसल वंश का अंतिम शासक वीर बल्लाल तृतीय जिसे मलिक काफूर ने हराया था। कदंब वंश कदंब वंश की स्थापना मयूर शर्मन ने की थी। कदंब वंश की राजधानी  वनवासी था। गंग वंश गंग वंश का संस्थापक बज्रहस्त पंचम था। अभिलेखों के अनुसार गंग वंश के प्रथम शासक कोंकणी वर्मा था। गंगो की प्रारंभिक राजधानी कुवलाल (कोलर) थी जो बाद में तलकाड हो गई। दत्तक सूत्र पर टीका लिखने वाला गंग शासक माधव प्रथम था। काकतीय वंश काकतीय वंश का संस्थापक बीटा प्रथम था। जिसने नलगोंडा (हैदराबाद) में एक छोटे से राज्य का गठन किया जिसकी राजधानी अंमकोड थी। इस वंश का सबसे ...